श्याम ! तेरे नामकाही, अब हमें अधार है
(तर्ज : आज मेरि लाज प्रभू !...)
श्याम ! तेरे नामकाही, अब हमें अधार है ।
तूहि करेगा तो होगा, बेडा मेरा पार है ।।टेक।।
भौंर विषयका है भारी, भूलते कदममें अपने ।
होश नहीं आवे जबके, क्या धरे किनार है ?।।१।।
नाव चक्करमें है आई, दोरती है आसामाँही ।
क्या करें सुझे नहि कुछभी, कैसे काटूँ वार हैं ? ।।२।।
संतसंग मिलना चाहे, कोइ ना नैननमें आवे ।
हम बडे उदास इससे, हो गये गँवार हैं ।।३।।
फिक्रकी गलेपर छूरी, काट कर रही है बूरी ।
लोभ - मोह - दंभ सारे, कर रहे निसार है ।।४।।
आपकी शरणमें आये, अर्ज पेशभी करवाये ।
कहत दास तुकड्या अब तो, नाथके अखत्यार है ।।५।।