श्यामसुंदरकी मीठी लगी बाँसरी
(तर्ज: खिदमते मुल्कमें गरचे...)
श्यामसुंदरकी मीठी लगी बाँसरी ।
मैंने छोड़ा मकाँ, उनको दिलमें धरी ।।टेक।।
कोइको लगति है सूत-मितकी हवा ।
कोइ बहते हैं विषयोंमें कर वाहवा ।
मेरि नैना भई सुनके वह बावरी ।।१।।
किसको प्रिय है गलीचे जरीके भरे ।
किसका दिल चाहता है कि धनमें मरे ।
मैंने कुंजनकी दिलमें हवा ले भरी ।।२।।
कोड पहने हैं. मोतनकी माला गले |
कोइ कुंडल रतनके जड़ाये भले ।
मैंने तुलसीकी माला गलेमें धरी ।।३।।
कोइ होते हैं आशक, पतीमें सती ।
कोइ जाते हैं भगके बढ़ा दुर्मती ।
कहता तुकड्या हमें याद ना दूसरी ।।४।।