सजनी ! बसंत दिल मन भाई
(तर्ज : सुदामजी को देखत श्याम...)
सजनी ! बसंत दिल मन भाई ।।टेक।।
छाय गयी हरियाली मनोहर, फुल-फल बहर भराई ।।१।।
फूल फुले जहँ किसम-किसम के, गंध सुगंध समाई ।।२।।
पीली कमली श्याम उतारे, कोमल रंग सुहाई ।।३।।
सुंदर बन सब छाय गयो है, देखि अजब प्रभुताई ।।४।।
पिवु पिवु बोलत प्रेम-पपीहा, कोयल रागनि गाई ।।५।।
तुकड्यादास कहे इस बनमें, मिलो मोहे श्याम कन्हाई ।।६।।