गुणदोष हमारे ना देखो

(तर्ज : यह प्रेम सदा भरपूर रहे...)
गुणदोष हमारे ना देखो, है तुम्हरा नाम दयाल हरी ! ।
एक लहज घुमादो दृष्टीकी, सब कट जावे भवजाल हरी ! ।।टेक।।
कइ गाँव-गटार मलीन अती, मिलजात नदी गंगा -निरमों ।
सब गंगारूप बने क्षणमें, फिर हमसे वहि कर ख्याल हरी ! ।।४।।
हो निर्मल मूरत लोहनकी; या छुरी होत कसाबनकी ।
लगतेहिं परिस बनता है कनक, फिर नहि देखे वह हाल हरी ! ।।२।।
तुकड्याके दोषको पार नही, बिन प्रभुके अब आधार नही ।
तुम तारक हो, ब्रिद है तुम्हारा, तुम दीननके प्रतिपाल हरी ! ।।३।।