रणछोड चले रण जीतनको
(तर्ज : यह प्रेम सदा भरपूर रहे... )
रणछोड चले रण जीतनको, तलवार रही घरहीमें पड़ी ।
नहि धीरज बलभी साथ जरा, तनभी दिखता जैसी लकडी ।।टेक।।
फड़तूस किये साथी अपने, खाने पीनेमें देर करे ।
खानेबदोश की पलटनमें, शत्रूकी सेना आन पडी ।।१।।
हिंमतके खजाने टूट पड़े, नहि भाला है ना बरछी है ।
रोनेको चले रण-आँगनमें, आँखे घरदारमें जकडी ।।२।।
वहिसी गत हमपे आन पड़ी, नहि साथि कोई बजवेैया है ।
कोइ रोता है, कोइ गाता है, सुननेवालोंको नींद चढी ।।३।।
कहे तुकड्या प्रेम निभा लेना, जो कुछ टूटासा गाया है ।
साथी तो घाती हैं हमरे, करके सब बातें यार ! नडी ।।४।।