गजब है इन मंदिरोंका, मंदिरोंके मालिकोंका
(तर्ज : क्यों नहि देते हो दर्शन... )
गजब है इन मंदिरोंका, मंदिरोंके मालिकोंका ।।टेक।।
मंदिरोंकों बाँध दे पर, प्रार्थना ना हो कभी ।
रात-दिन गंदी पडी, अरू देव उसमें नित्य भूखा ।।१।।
चित्तमें उव्दिग्नता, होती है पैदा देखकर ।
शांति तो पाती नही पर, क्रोध आता है उन्हींका ।।२।।
मालिकोंके ख्याल तो, ऊँचे तमासोंमें लगे ।
कौन जाने धर्म-देवल ? मूँह ना देखे उसीका ।।३।।
बुजरूगोने बाँधकरके, कर दिया घरमें दिया ।
कहत तुकड्या तोड़कर, इनने किया रोना उसीका ।।४।।