वाहवा ! हैं हिंदुओंके, मंदिरोंकी वाहवा !
(तर्ज : क्यों नहि देते हो दर्शन... )
वाहवा ! हैं हिंदुओंके, मंदिरोंकी वाहवा ! ।।टेक।।
घरधनी पूजे नहीं, घरेमेंभि मंदिर होयके ।
नौकरोंसे काम ले, ऐसे बिरोंकी वाहवा ! ।।१।।
कोई तो मंदीरमें, झाड़ू लगे नहीं वर्षभर ।
खाद और पूँजे पडे, ऐसे धिरोंकी वाहवा ! ।।२।।
मूरती तो देखती, कब आयगा मेरा भगत ? ।
आ रहे बीडी पिते, ऐसे शुरोंकी वाहवा ! ।।३।।
घोरसे घंटा बजे, और बोंब मारे जोरसे ।
झोंक दे पानी उपर, ऐसे नरोंकी वाहवा ! ।।४।।
चल बसे वो भक्त उनके, जो उन्हींको प्रीय थे ।
आज है यह अवदशा, इने बहांदुरोंकी वाहवा ! ।।५।।
कहते तुकड्या है नही, टीका जरा भी यह मेरी ।
कइ जगह मैं देखता, ऐसे हिरोंकी वाहवां ! ।।६।।