सजनी ! श्यामसुदर कहाँ खोया ?

(तर्ज : जगमें हीरा मिलत कठीना.. )
सजनी ! श्यामसुदर कहाँ खोया ? अजहँ न दर्शन पाया ।।टेक।।
कुंजन बनकी गर्द लतामें, ढूँढ ढूँढ नहि पाया ।
पूछ फिरूँ बनकी पतियनको , क्यों नहि देत बताया ?।।१।।
जमुनातटपर खेलत गौएँ, वहिंपर खोज लगाया ।
उमड़-उमड़कर गौएँ देखे, क्यों ब्रजवासि न आया? ।।२।।
कहिं गोकुछ, कहिं मथुरा होवे, वहाँपर नैन सताया ।
मनमाने गोपाल ढँढोले, अंत जरा नहि आया ।।३।।
सब जग ढूँढा साधन करकर, तरज-तरजसे गाया ।
तुकड्यादास कहे आखिरमें, हरि भक्तनसँग पाया ।।४।।