गुरुराज गजानन संत बडे

(तर्ज : यह प्रेम सदा भरपूर रहे... )
गुरुराज गजानन संत बडे, परमारथके अधिकारी थे ।
जिनके चरणोंकी भक्तीको, कइ लाखोंभी, नर-नारी थे ।।टेक।।
थे मस्त रँगे अपने तनमें, नहि थी सुध दुनियादारीकी ।
अवधूत दिगंबर प्यारे थे, अपनेमें आप उजारे थे ।।१।।
लाखोंकी इच्छा तृप्त करी, लाखोंके मन परकाश दिया ।
खुद अनुभवके भंडारे थे, दासोंके नित रखवारे थे ।।२।।
थे मुस्लिमके वलिराज बडे, हिंदुके थे वे मुकुटमणी ।
नहि था यह भेद कहीं उनमें, सबमें रहके फिर न्यारे थे ।।३।।
जो चितसे ध्यान धरे उनका, वे दर्शन अभितक पाते है ।
शेगाँव खुला दरबार भरा, जहाँ पहिलेसे रम जाते थे ।।४।।
तुकड्याकी आसा पूर्ण करी, उनकी धुनमें रम जानेकी ।
खुद धुनिया थे धुनवैया थे, भारतके नैया-तारी थे ।।५।।