वाहवा रे वैभव शूरोंका ! देख नजर हैरान करे

                     (छंद)
वाहवा रे वैभव शूरोंका ! देख नजर हैरान करे ।
धन्य मिला तकदीर सिकंदर, जिनका लाखों ध्यान करें ।।टेक।।
नरमें भी न वीरसिंह, कोइ आते हैं जश गानेको।
धर्मकि रांह बताकर जगमें, ध्वज उँचा फहरानेको ।।
धन्य उन्हीकें मात-पिता हैं, ग्यान दिया जिसने उनको ।
धन्य उन्हींके गुरु-संते हैं, मंत्र दिये जैंगे तारनको ।।
ऐसे बीरे-शूर भारतमें, फिर कब प्रभु ! निर्माण केरें ?।
धन्य मिलो तकदीर सिकंदर०।।१।।
माला जिनके वही हाथमें, भारत कब आजाद बने ? ।
पूजा उनकी वही हमेशा कब जगका दुख बाते बने ? ।।
स्नान उन्हींकें उन्ही जलोंसे, झूठोंका नि:पात बने । 
चंदन उनके सिरपर वह है, सारे अपनी जाते बैने ।।
चैन नही पल पडे कि जबतक, ना किसका कल्याण केरे ।
धन्य मिला तकदीर सिकंदर०।।२।।
मकाँ उन्हींका वहीं बनी, जहाँतक के लडते आते हैं ।
पूजा-घर है वहीं जहाँपर, जशका मंत्र जपाते हैं ।।
दिवान-घरे है वहीं जहाँपर, लडके शस्त्र पढ़ाते हैं ।
भोजनकी तृप्ती है उनको, सैनिक रणमें जाते हैं ।।
सुख-निद्रा है वही कि जबके, धर्मपे जी कुर्बान करें ।
धन्य मिला तकदीर सिकंदर०।।३।।
सिर उन्नत और निर्भय वृत्ती, ये जिनेपे पहिराव चढे ।
स्वतंत्रताके ग्यान जिन्होंने, छातीपे पट्टे जकडे।।
दया दीनपर, धर्मका पालन, ये कंगन हाथोंमें पडे ।
शील-सत्य बानेका जिनके, चहरेपर परकाश पडे ।।
जरूर है हमको भारतमें, प्रभु ! ऐसे नरें दान करें ।
धन्य मिला तकदीर सिकंदर०।।४।।
मैं बैठा थो सोचमें उस, कब भारतके दुख छूटेंगे ?।
घर-घरमें आनंद समाकर, स्वर्गतुल्य सुख लूटेंगे ?।।
बडी बिपत आपहुँची, भगवन्‌ ! सब घर अबके फूटेंगे ?।।१।।
जीवलोकका कसूर ना होते ही. जीवन टूटेंगे ।।
इनके जीवन अभी बचाने, कब तू नर निर्माण करे ?।
धन्य मिला तकदीर सिकंदर०।।५।।
कागजका एक पुतला था, उसपरही मेरी नजर गयी ।
तमाजीका था वह चेहरा, देखके छाती गारे भयी ।।
मैंने कहा कि ऐसे समयपर, वह तानाजी रहा नही ।
छत्रपती शिवराज नही, महीराणा बीर प्रताप नहीं ।।
तुमपर है यह जोखिम बीरों ! अमल न बोधके बान करें ।
धन्य मिला तकदीर सिकंदर०।।६।।
हम नहिं चाहते हैं किसकाभी, बुरी तौरसे मरना हो ।
हम नहि चाहते हैं किसकाभी, बुराइसे धन भरना हो ।।
हम नहि चाहते हैं किसकोभी, गुलाम होकर रहना हो ।
हम नहि चाहते हैं सत्परभी, दुर्जनके ऊठें बाहो ।।
तुकड्यादास कहे इस जगमें, प्रभू ! नीति निर्माण करें ।
धन्य मिला तकदीर सिकंदर०।।७।।
हरि: ओम तत्सत्‌
श्रीमत्‌ सद्गुरुचरणारविंदार्पणमस्तु ।