गुरु ! मत करिए अब बेर, शरण हम आन पडे
(तर्ज : घर आये लछमन राम...)
गुरु ! मत करिए अब बेर, शरण हम आन पडे ।।टेक।।
तुम्हरो नाम पतित - पावन है, सुनकर आये द्वार ।
सच्चा ग्यान दिलाकर हमको, कर दो बेडा पार ।। शरण०।।१।।
हम निर्भय हो तनसे मनसे, बुध्दि रहे गुणवान ।
देश-धर्मकी सेवा करने, तुमही दो बरदान ।। शरण०।।२।।
निर्मल तुम्हरो ग्यान गुरुजी ! दो सबको संदेश ।
अखिल जगतके मानव तुमसे, दूर करावत क्लेश ।। शरण०।।३।।
तुम्हरी निर्मल ज्योति हमारे, दिलमें दें परकाश ।
पाप कपट छल झूठी ममता, हो इसका सब नाश ।। शरण०।।४।।
ना हम जाने जप तप साधन, ना करते हैं योग ।
तुम्हरे दासनकी सेवाका, रखते हैं उद्योग ।। शरण०।।५।।
यह भोली भक्ती है हमरी, करिए प्रेम प्रदान ।
तुकड्यादास आरती गावे, खोकर देह-गुमान ।। शरण०।।६।।