वेद - शास्त्र तुम पढे हो पर
(तर्ज: हबालदिल हो गया जमाना...)
वेद-शास्र तुम पढे हो पर, यह जनभाषा नहीं जानोगे ।
बिन उसके नहीं समाज सुधरे - क्या कहना यह मानोगे ?।।टेक।।
हो ऊँचे पण्डीत साहित्यरत्न, विद्वान बडे ।
जबतक कदर नहीं गरीबोंकी,है तबतक सुनसान पडे।।
जीवनका साहित्य बिगडकर, गली -गलीमें सोया है ।
बिन उसको अब चेत किये,वह जश न किसीको आया है।।
कौन पूंछता आज सनातन? लगी तनातन आपसभें ।
पर्वतपर पर्वत टकराये, रही मजा क्या खसखसमें ?
भ्रातृभाव सब खतम हुआ,फिर साम्यवाद क्या कहते है।
बिना प्रेमके जिये न कोई - हम सिध्दांत सुनाते है ।।
कहो कौन जाता गरिबोंके घर-घरमें अपनानेको ?
उनका रोना सननेको, दो-चार शब्द बतलानेको ?
अब साहब बनने से होगा,कभीभि देश सुधार नहीं ।
ज़बतक जनतासे हिलमिलकर,कर लोगे तुम प्यार नहीं ।।
नेता छल - कपटी हो बैठे, तो मीठा संसार नहीं ।
तुकड्यादास कहे अब चेतो,नहिंतो दुखको पार नहीं ।।