विश्व बसा है मकान मेरा

          (तर्ज: हरिका नाम सुमर नर प्यारे...)
विश्व बसा है मकान मेरा, मुझको क्या चिन्ता  मेरी ? ।
काम करूँ और नाम जपूं, सेवामें धरू जिन्दगी सारी ।।टेक।।
मेरी शक्तिसे जो -जो बनता, मेरा नहीं  वह  इंश्वरका ।
अपना -परका भेद न मुझमें,डर  ही  कहाँ  जरका -घरका ? ।।
जहाँ मिले जो-जो भी मिले, वे सारे मित्र  हमारे  है ।
दिलमन से वह प्यारे हैं, मुझे प्रिय आत्माके तारे है ।।
समाधान है मेरा खजाना, सुख-दुख में समता मेरी ।
काम करूँ और नाम जपूं 0।।१।।
अरे मित्र! तुमको चढना है, ऊँचा यह मंजील बडा ।
रोज करो अभ्यास यही, परमेश्वर ही है भरा पडा ।।
जिधर में देखू उसीकी सूरत,उसीकी मूरत नजर पडे।
मैं - तू  यह है भ्रम सब फैला, माया के सारे लफडे ।।
क्यों में कहू छोटा अपनेको ? -जाती -पंथ धरमवाला ?
अविनाशी है आत्मा मेरा, प्रेम का गहरा मतवाला ।।
भ्रमर हूं मैं इस निजानंद का, सुन्दर है  वृत्ति   मेरी ।
काम करूँ और नाम जपूं 0।।२।।
क्या बरबादी और आबादी, दोनों ही ये खिलौंना है ।
जीना है तो बहाना है  मरनेपरभी   वहीं   गाना   है ।।
अपनी खुशी से आना है, अपनेही वतनको जाना है।
इतनाही तो पढना है, फिर मूल ठिकाना   पाना  है ।।
तुकड्यादास कहे, जो लागी,कहाँ टूटे तारी मेरी ?
काम करूँ और नाम जपूं 0।।३।।