शूर नहीं रण में डरता है
शूर नहीं रण में डरता है। भले वह लडते मरता है ! ।।टेक।।
सत्य-बचन साधन है उसका। चारित्र्यहि सब धन है उसका।
संकल्पित कर तीर छोड़ता । गगनको फाड़ गरजता है ! ।।1।।
पंचानन की सुन ललकारी । जंबुक भागे मार भरारी ।
एकहि डरकाई सुनी जावे । जिव-जन भाग सुधरता है ! ।।2।।
नहिं दुष्टोंकी हिम्मत होती । छूटे बलकी दे मजबूती ।
तुकड्यादास कहे निर्भयपद । पायेगा वहि तो तरता है ! ।।3।।