वाहवा ! वह कैसे ईन्सान ??

        (तर्ज : उध्यता! अजब तुझे ससकातं...) 

            वाहवा ! वह कैसे इन्सान ? ? 
जरा न करता श्रम जीनेकों,उल्टी मारे तान! ।।टिक।।
खाना तो करता है पैदा। पान -बिडीका खर्खा जादा |
निभे न करके करे मिलावट, झूठ मिरावे शान ! ।।1॥ 
रहनेकों बंगला है बांका । है पहिराव शहंशाहं का।
लेकिन  बुध्दी   है   चोरीकी, सदा   रहें   हैरान ! ।।2॥
साधु-सन्तसे कभू न नम्रता हीन-दीनसे करे न ममता।
दान-धरम को तो मुँह मोडे, चाहता सबसे मान ! ।।3।।
तुकड्घादास कहे,इस नरको। कभू न आने देना घरकों । 
भले वो संकट  में   हो   कोई, चाहे   जावे   जान ! ।।4।।