गया गया रे, समय तेरा गया रे । गया जीवनके पार, रहा थोडाहि आधार,

(तर्ज : चली चली रे पतंग मेरि चली रे...) 

गया गया रे, समय तेरा गया रे ।
गया जीवनके पार, रहा थोडाहि आधार,
अबतो करले सुधार,नहिं तो खोया रे ! ।। टेक ।।
था बचपन खेलमें गमाया।
कुछ ग्यान नहीं पढ़ पाया।।
अब आगयि जवानी, भरि खून में शैतानी
दिनरात विषयमें  सोया रे  !   ।।१॥
सारा बदन भया है ढीला।
गढ़  गया मौतका खीला।।
लगा आखरिका दम, नहीं उठता कदम,
नहिं मुखमें प्रभु-गुण गाया रे !  ।।२ ॥
अब मौत रही है बाकी।
पड़ गयी  बदनपर झाँकी ।।
कहता तुकड्या ये दास, कोई गुरु करले पास,
तब छूटे  ये  तनकी  माया रे  ।। ३ ॥