विश्व है संसार प्रभुका

        (तर्ज ;: आकळावा प्रेमभावे श्रीहरी . . . )
विश्व है संसार प्रभुका, जीव उनके पुत्र हैं।
वही   चलाता   पंच - तत्वोंके    सहारे  सूत्र  हैं ।।टेक।।
अजब है ये राज उनका,खुद तो न्यारे ही रहे।
रचना    सुंदर    है  बनायी,  जरुरतें  सर्वत्र     है ।।1।।
सबने मिलकर एक रहना ही सिखाया है हमें।
सब परस्पर के हो पूरक, यदि अलग सब गात्र हैं ।।2।।
एक घरसे ग्राम तक में, एक देशसे अन्य तक में ।
ये समझ आयेगी जिसको, वही  बनेगा  पात्र    हैं ।।3।।
अगर ऐसा करदे कोई, नर नहीं भगवान्‌ वो हैं ।
तुकड्या कहे हम  हैं  अधूरे, जब नहीं  एकत्र  हैं ।।4।।