सद्गुण दुर्गुण एकही है जो !

       (तर्ज : सुनी खबर कि संत गाडगेबाबा...)
सद्गुण दुर्गुण एकहि है जो ! समझ -समझका फेर रहा 
ज्ञान नहीं होता जबतक के, ऐसाही अंधेर रहा ।।टेक।।
बालकपनसे शिक्षण पावे, तब कक तो आडे क्यों जाये?
पशुपक्षीके संग रहे थे, उस   संस्कारको   ले   आये ।।
खाना पीना,विषयवासना,यहिं गाना था जनम-जनम।
इंद्रिय उसमें मस्त रहे हैं, करके नहि चलती है कलम।।
दोष जीवोंका नहि है भाई ! वही  रंग   कुछ   देर  रहा ।
                        ज्ञान नही होता0।।४।।
आत्माभी जीवभी एकसा, मनभी तो एकही   सा   है ।
बदन -बदनमें फरक नही है, क्यों बोलो फिर वेसा है?
पहले कुछ संस्कार रहे  है, करके   घोडा - म्हैसा  है ।
वैसेही   सज्जन - दुर्जनका   फेर  पडा   आपैसा   हे ।।
सत्संगतकी रही कमी करके   वह   इतनी  बेर  रहा ।
                       ज्ञान नहीं होता 0।।२।।
टुसरेपर आघात करे, करके वह ॒ दुर्गुण मात्र   हआ ।
समानताका काम करे, वह सज्जन कहने पात्र हुआ।।
प्रेम - प्रेममें कितने डूबे, पापपुण्य    समझे   न   कहीं ।
मलिन बुध्दि पशुतुल्य रही है,उनको किसका दोष नहीं
तुकड्यादास कहे यहि जीवन, कोई बकरी कोइ शेर रहा ।
                         ज्ञान नहीं होता 0।।३।।