गुरुबिन ग्यान न होई
(तर्ज: रामरतन धन पायो... )
गुरुबिन ग्यान न होई, समझ मन ! ।।टेक।।
स्वामी सीतारामदास ने बारबार समुझाई ।
यह योगी अति निर्भय प्रिय है,राम-उपासक भाई !
स्वामीजी मेरे ।।१।।
अष्टप्रहर अभ्यास समाधी,ध्यानमगन गुण साई ।
नित्य करे एकान्त मननको, जनगण बोध कराई ।।
स्वामीजी मेरे ।।२।।
सतजुगसी आयू है जिनकी,समझत नाहि दिखाई ।
मेरे परमहृदयके बंधू ! कहे तुकड्या दोउ नाहीं ।।
स्वामीजी मेरे ।।३।।