सदाचार की अमर - संहिता
(तर्ज : वन्दे मातरम्, बन्दे मातरम्...)
सदाचार की अमर-संहिता, जुग-जुगमें भी गायी है।
मगर ये मानव भटक रहा है, अभी जगा नहीं पायी है।।टेक ।।
दूसरों का ही मुफ्त मिले तो, चोर-मोर से खाता है।
कभी न पर्वा उसकी करता, तोड़ ही देता नाता है ।।1।।
अरे भाई, हम, रहे पडोसी, कभी तो उनसे काम पड़े
मतलब खातिर हाथ जोड़ता, पल नहिं जाता तो झगड़े ।।2।।
ऐसा नहीं होता मानवका, पशु भी प्रेमसे रहता है।
मिलकर खाता, मिलकर चलता,मिलकर चरता रहता है ।।3।।
तुमतो बिलकुल उनसे गुजरे, प्रेम नहीं ना नेम नहीं।
कहाँ जिवोगे मिला जो तुमको ,तुमरे माफिक कहीं नहीं ।।4।।
हम तो अपनी अर्ज सुनाते, यह उपदेश नहीं गाते।
तुकड्यादास कहे सुनना हो तो, सुनलो दिलकी बातें ।।5।।