संयम से ही चलना अच्छा

        (तर्ज : वन्दे मातरम्‌, वन्दे मातरम्‌...) 
संयम से ही चलना अच्छा, हमने गुरुसे सीखा है।
चिल्लाते फिरते हैं, उनको कदम-कदम पर धोखा है ।।टेक।।
खाना -पीना-रहना-चलना, सोना भी संयम से हो।
तब तो सब कुछ ठीक रहेगा, नहीं तो मरिज बनके रहो ।।1।।
जब अपनी बारी आयेगी, तब तो चिल्लाना अच्छा ।
क्या करना, क्या नहीं करना; तबही कह देना है सच्चा ।।2।।
नागानी का बीच-बीच में, कहना होता खतरा   है ।
या तो हो अधिकार भी वैसा, बात जपे कहे वाहवायें ।।3।।
इसी कारणसे चूप रहा था, भीष्म पितामह संयम से ।
गर कहता तो फजूल जाता,भुल होती अपने गमसे ।। 4।।
अदबसे रहना होता जगमें, अपने बलपर पैर   धरे ।
आगे-आगे करके क्योंकर, कीचड में जा घुँस मरे ?।।5।।
यही है दुनिया आज समझलो, अपना सच्चा काम करो ।
यही धरम है, यही है भक्ति; गुरुकी आज्ञा सिरपे धरों ।।6।।
तडफड करके क्या पावोगे? काले हाथ बनावोगे ।
आया झटका सिफारसोंका, पताल में घर पावोगे ।।7।।
तुकड्यादास कहे, अपना ही काम करो तुम नेकीसे ।
संयम मत छोड़ो मन-तन का, बचे रहो इन झंझटसे ।।8।।