गांधी का था मन्दर सुन्दर । बड-पीपल की छाँवमें
(तर्ज: रामभजनबिन को सुख पाया... )
गांधी का था मन्दर सुन्दर ।
बड-पीपल की छाँवमें भूपर ।
मैं भी वहीं रहा था ।।टेक।।
एकहि थी, कुटियासी । सेवाग्राम, धाम बसी ।
जनताकी भीड लगे, आरपार ।
में भी वहीं 0 ।।१।।
निसर्ग की, लहर खुले । लैन लगा, प्रार्थना चले ।
बापूकी तार चढ़े, एक धार ।
मैं भी वहीं 0।।२।।
गीता की, प्रिय बाणी । दिल-मनसे, जाती सुनी ।
शान्ति मिले ग्याममें, भक्ति प्यार
मैं भी वहीं0।।३।।
जो भी मिले, एक कहे । स्वतन्त्रता लेके रहें ।
यही चलती बात वहाँ, कर सुधार ।
मैं भी वहीं 0।।४।।
साथी था उनका । सेवाका, चिम्तन का
तुकड्या कहे प्रेमही, था अपार ।
मै भी वहीं 0।।५।।