गांधीजी, हरदम सुनते बराखा
(तर्ज: सच्चा धरम नहि जाना...)
हरदम सुनते बरखा
गांधीजी, हरदम सुनते बरखा ।।टेक।।
सेवाग्राम में मैं था कुछ दिन, खूब चलाया चरखा ।
बापू मुझसे प्रसन्न थे जब, मेरा भी दिल हरखा ।।१।।
रोज-रोज दसबीस श्लोक हम लिखकर नये सुनाते ।
बडी चावसे सुनकर बापू, प्रेम - भावसे गाते ।।२।।
किस्मत से जब राम मिले तो तीन जगह मिलती हैं ।
धन-जन-मान सभी जाता और बाद भक्ति फलती हैं ।। ३।।
ऐसा भेख चढा दो मुझको, फेर पलट नहि आऊँ ।
मुझमें राम राममें में हूँ रोशनी में प्रभु पाऊँ ।।४।।
येही भजन उनको भाते थे, बारबार कहवाते ।
सरहद गांधी साथ बैठकर, हम सब मिलकर गाते ।।५।।
कभी कभी पण्डीत जवाहर सेवाग्राम में आते ।
हाथ पकड़कर गांधी मेरा, भजन उन्हें सुनवाते ।।६।।
कस्तुरबा राजेन्द्रबाबु की उन्ही दिनों सेवा थी ।
तुकड्यादास कहे बापू की संतसंग में प्रीति ।।७।।