गांधी उठे प्रातःसमय, प्रातःस्मरण करतेहि थे

               (तर्ज: हिंदभूच्या लेकरा...)
गांधी उठे प्रात:समय, प्रात:स्मरण करतेहि थे ।
कोई रहे या ना रहे, निज मार्ग अनुसरतेहि  थे ।।टेक।।
सोते अगर   सेवक    वहाँ, उनको   जगाते    प्रेमसे ।
खुदका ख़ुदी कर काम सब,दो-चार मिल फिरतेहि थे ।। १।।
चरखा चलाते बैठकरके, आत्मका चिन्तन   करे ।
यह देश कैसे हो सुखी ? सब योजना स्मरतेहिं थे ।।२।।
जो भी कोई आया हितैषी बात   कर   समझायेंगे ।
इस देशका तू है घटक यह  भावना   भरतेहि   थे ।।३।।
सत्प्रेम उनका था निरागस, बालकों -बहनोंहि पर ।
दलितों-मरीजों से भी मिल सबका भला बरतेहि थे ।।४।।
सुविचार लिखते थे कभी, उपवास रखते मौन भी ।
तुफानमें भी शान्तिसे नित  प्रार्थथा   करतेहिं   थे ।।५।।
निन्दा चले, आपत्ति हो, पर्वा न थी  गांधीजीको ।
तुकड्या कहे ना हो बुरा, इस बातसे   डरतेहि थे ।।६।।