गौओंकी करता था सेवा, गांधीजी

            (तर्ज: सच्चा धर्म नहि जाना.. )
                 गौओंकी करता सेवा,
          गांधीजी गौओंकी करता सेवा ।।टेक।।
घास डालकर हाथ घुमावे, अंग खुजावे उसका ।
साथीजन से कहे प्रेमसे, भागीदार हो   जसका ।।१।।
गौओंकी   रक्षा   हो   बोले   अपने  भारतमाँही ।
दूध बढे, बच्चे अच्छे हों, बैल मिले  सुखदायी  ।।२।।
घर-घर में हो गौमाताका दूध-दही -मक्खन  भी ।
खेत फलेगा,स्वास्थ्य बढेगा, दिल होंगे सज्जन भी ।।5।।
हरी घास,पानी अति सुन्दर,खली-खुराक खिलाओ ।
फिर देखो माता का वैभव, दस देदो  सौ   पाओ ।।४।।
एक दिन देखी तडपती बछिया,दु:ख सहा नहि जावे ।
उसको मुक्ति दिला दो बोले, जो बचने नहि पावे ।।५।।
आजादी में भारतमें   गर   गैया    कट   जायेगी ।
कहता तुकड्या गांधी बोले, मुझे मौत  आयेगी  ।।६।।