सत् संगत हर घडी, करेसे मनकी आदत मुडी

           (तर्ज : मोल न कुछ भी लिया... )
सत्‌ संगत हर घडी, करेसे मनकी आदत मुडी।
सत्‌-चर्चासे जुडी,टूटी थी,मनकी  मनसे  घडी।।टेक।।
जब-जब जाये,मन बहकाये तब-तब साक्षी बात बताये।
विवेक मारे उडी।। करेसे मनकी आदत मुडी 0।।1।।
अपने ही आसनपर जागो, बाहरमें भटके नहीं लागो।
समझाया, दे चढी ।। करेसे मनकी आदत मुडी 0।।2।।
आसक्ती के डोर बंधे थे, उनपर मनके बार सधे थें।
सोच समझ जब पडी।।करेसे मनकी आदत मुडी0।।3।।
जागृति जब सपनेमे जावे, तब तो मन यह रंग मचावे।
करता नाटक खड़ी ।। करेसे मनकी आदत मुडी 0।।4।।
वहाँ भी जाऊँ ग्यानके द्वारा, कहूँ मन तेरा झूठ पसारा।
विकल्प करता बडी ।।करेसे मनकी आदत मुडी 0।।5।।
अबतो मन देखे शरमावे, गोता देने लाज ही आवे।
वही खुद बन गया गड़ी।।करेसे मनकी आदत मुडी 0।।6।।
तुकड्यादास कहे लगो पीछे, तबतो मनकी राह भी सूचे।
मारी भजन में बुडी।। करेसे मनकी आदत मुडी 0।।7।।