विश्वसे निर्वाह करते, फिरभी रहते क्यों अलग हो ?

                (तर्ज : आकळावा प्रेमभावे... )
विश्वसे निर्वाह करते, फिरभी रहते क्यों  अलग   हो ?
मित्रता रखते कभी, फिरभी तो कहते क्यों सजग हो ? ।।टेक ।।
ये तमासा क्यों है इसमें ? बुद्धि की नहीं पोंच क्या?
क्या अलग है धर्म अपना? -किसने बोला न्यारा जग हो? ।।1।।
सत्य सबका एक है और प्रेम सबका एक है।
मरना औ जीना एक है, फिर बिच - बिचमें क्यों ये ढंग हो? ।।2।।
जब हमें जरूरत पढ़ें, तब दाना-पानी माँगते।
आता है जब संकट उन्होंर, देते सबका फिरभी सँग हो?।।3।।
हम है इतने अब नजिक कि भूलसे रहते है न्यारे ।
कहत तुकड्या खोजलों, ईश्वर तो कहता नहीं अलग हो।।5।।