गुरु -किरपा का अर्थ यही है, मेरा मैं जानूं !

     (तर्ज : गुरु-कृपा का अंजन पाया...)
गुरु-किरपा का अर्थ यही है, मेरा मैं जानूं  !
लगी-प्रभूसे लगन सही है, मेरा  मैं   जानूं ! ! ।।टेक।।
दिलमें जिसके त्याग भरा है, जरा न भाँता छलबल है ।
जीवन हैं संयमी हमेशा, अन्दर-बाहर   निर्मल   हैं ।।
जो आवे उसके सँग प्रीति, अपनी आत्मा समझाने ।
सद्विचार लेना और देना, सदा नम्रता पहिचाने ।।
द्रोह-दुश्मनी दूर गयी है, मेरा मैं जानूं  !
लगी प्रभूसे लगन सही हैं, मेरा   मैं    जानूं  ! ।।1।।
सत्‌-संगत की निशा हमेशा, प्रभू-नाम की मस्ती है ।
सत्‌चित्‌ आनंद रूप समझकर, बढे जिन्होंकी किस्ती है।।
सुख-दुख दोनो में हैं समता, राज मिले या धुली मिले ।
सबका भला हमेशा हो, यह बात सदा मुहसे निकले।।
अपना -परका भेंद नहीं है, मेरा मैं जानूं  !
लगी प्रभूसे लगन सहीं है, मेरा   मैं   जानूं  ! ! ।।2।।
यह संसार लिला राघव की, समझ के खेला करते हैं । 
यहाँ वहाँ क्या सथी विश्व में कर संचार बिचरते  है ।।
जरा न डर है जनम-मरनका, सतगुरु नामसे तरते है।
पल-पल बीता जात मस्तीमें, अपनी धुन में रहते हैं।।
यही जिन्हों की राह सही है,मेरा मैं जानूं !
लगी प्रभूसे लगन सही हैं, मेरा   मैं  जानूं ! ! 0।।3।।
कई जनम के सुकृत जिनके,उनको यह ब्रत मिलता है।
एक दिनके हाथ पैर जोडे मिलती महीं सफलता है।।
निश्चय जिनका अटल रहा है,पायी जिन्हें सफलता है
तुकड्यादास कहे गुरु-किरपा,उनके मथ्ये फलता है।।
मन मुखियों को मिले नहीं,यह मेरा मैं जानूं !
लगी प्रभू से लगन सही हैं, मेरा  मैं  जानूं ! ! 0 ।।4।।