ग्यान के दाता, कर हमसे भी, जो कुछ थोडा बनता

                   (तर्ज : ओ मनिर्दयी प्रीतम ...)
                       ओ ! भाग्य-निर्माता ? ? 
ग्यानके दाता, कर हमसे भी, जो कुछ थोडा बनता! ।।टेक।।
समय नहीं अब बननेकी, फिरभी गरज हमें उनकी। 
बिना भाग्यके नहीं चलेगी, गती-बिधी पूरी मनकी ।।
प्रयत्न से ही, सब लड़ते पर, सफल नहीं  होता ।।1।।
गली -गली नहिं भाग्य पडा, चाहे कोई लेके उडा।
ऐसा हो तो सब बनते थे, भारी नेता बडा-बडा।।
इनमें होना, दोनों बाते, करनी और   पूर्व   गीता ।।2।।
हमतो हैं कर्तव्यधारी, लेकिन किरपा बिन तेरी 
किसकी नहीं चली थी जगमें, आज चले नहीं पुरी ।।
इसीलिये यह समझाना है, दर्शन   में  दो   बाता ।।3।।
ग्रंथ-संग सब जगा मिले,पर गुरु-किरपा नहीं फूले
इसका कारण हमने पाया,संत न मिलते कहीं भले ।।
तुकड्य दासने,यौं ही गाया,जहाँ मिले में जाता !।।4।।