गांधीजी चिन्तन करे, भारत मेरा उन्नत बने

              (तर्ज: आशा तुजभोवती. .. )
गांधीजी चिन्तन करे, भारत मेरा उन्नत बने ।
हो फटाटूटा भले, पर नेकही   सेवक   बने  ।।टेक।।
नीच - ऊँचा भेद छूटे, सब बराबर प्रेमी   हों ।
कार्य अपना सब करें, पर मेल से ही बल बने ।।१।।
तेज हो तप का यहाँ,और त्याग की हो मान्यता । 
ग्यानी हों निर्भय, प्रजा सत्संग के लायक बने ।।२।।
मेरी पूजा है यही, उपकार   सबका    धर्म   हो ।
सन्त-मतके बापु थे, अब शास्त्र भी  वैसे  बनें ।।३।।
हिन्दु हो, मुस्लीम हो, या हो इसाई  बुध्द भी ।
सत्य का पद प्राप्त करने, ये सभी तत्पर बनें ।।४।।
कोई यदि मेरा कहावे, पर चले   विपरीत  ही ।
कहत तुकड्या वह जमाने में कलंकित ही बने।।५।।