गांधी ही अपने ढंग का ऊँचा फकीर था
(तर्ज: आओ सभी मिल जायेके...)
गांधी ही अपने ढंग का ऊँचा फकीर था ।
था लोकप्रीय सच्चा, मानव का पीर था ।।टेक।।
भंगी रहे या ब्राह्मण, सबसे समान था ।
मजदूर-अमीर-साहब,सबकी ही जान था ।
बैठे महल या कुटिया, फिरभी वजीर था ।।१।।
अल्लाह जपो कोई, या राम - नाम लो ।
चाहे जपो येशूको, कहे दिलसे काम लो ।
सादे रहो सीधे रहो, यह मन्त्र धीर था ।।२।।
उद्योग-खेती का तो, प्यारा था वह मोहन ।
गैया की भी आँखोंका,तारा था वह मोहन ।
हर गाँव - गाँव उन्नत करने अधीर था ।।३।।
बेकार न हो कोई, श्रमसे जिये - मरें ।
कालाबजार ना हो, व्यभिचार ना करें ।
तुकड्या कहे गीता का,वह भक्त-वीर था ।।४।।