चल देख सुरत अब तेरी
(तर्ज : तेरे दया-धरम नहीं मनमें ..)
चल देख सुरत अब तेरी, मुरदा बन गयी बदन बिचारी ! ।।टेक।।
जबसे तूने शराब पिना सीखा है, रे भाई ।
जला दिया सब रक्त-मासको हड्डी गयी पिसाई ! ।।1।।
मान-मरातब सब खोया और हँसते जन मुंह ताके ।
पडता हैं गलियोंमे जाकर, मक्खीसे मुह झाँके ।।2 ।।
पास रही ना कवडी, सारा उधार कर-कर खोया ।
औरत -लडके -बच्चेका भी जेवर तोडके खाया ! ।।3।।
घर बेचा, संसार भी बेचा, बेची इज्जत अपनी ।
जम आया तब तन भी बेचे,पहन अग्निकी कफनी ।।4।।
कौन है तेरे, साथी-संगाती, जिसने तुझे बिगाडा ?
उसने तो ऐसाही मारा, तेरा सब कुछ गाडा ! ।।5।।
तुकड्यादास कहे,सुन मेरी,ऊँची नजर तो कर ले।
देख कहाँ तू था और अब है,अपना जिवन सुधर ले ! ।।6।।